नीति आयोग का गठन सहयोगपूर्ण संघवाद के महत्वपूर्ण लक्ष्य को साकार करने और एक मजबूत राष्ट्र राज्य के निर्माण के लिए भारत में सुशासन को संभव बनाने के लिए किया गया है।
सहयोगपूर्ण संघवाद की दो प्रमुख विशेषताएं हैं: केंद्र और राज्यों द्वारा राष्ट्रीय विकास एजेंडा पर संयुक्त रूप से ध्यान; और केंद्रीय मंत्रालयों के साथ राज्य के दृष्टिकोण की वकालत।
17 जून 2018 को आयोजित नीति आयोग की शासी परिषद् की चौथी बैठक में, प्रधान मंत्री ने विकास के परिणामों को आगे बढ़ाने और भारत के लिए दोहरे अंक में समावेशी विकास हासिल करने के लिए प्रभावी केंद्र-राज्य सहयोग की आवश्यकता पर जोर देते हुए एक बार फिर सहयोगपूर्ण संघवाद को प्रेरित करने के मंच के रूप में नीति आयोग के महत्व पर प्रकाश डाला।
नीति आयोग का यह निरंतर प्रयास है कि राज्यों की सक्रिय भागीदारी के साथ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं, क्षेत्रकों और कार्यनीतियों का एक साझा दृष्टिकोण विकसित किया जाए, जिसमें राज्य नियोजन प्रक्रिया में भी बराबर के हितधारक हों। इसे ध्यान में रखते हुए, नीति आयोग के वर्तमान उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार ने विकास के एजेंडा के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए अंतर-क्षेत्रकीय और अंतर-विभागीय मुद्दों के समाधान के लिए एक मंच तैयार करने हेतु सभी राज्यों का दौरा करने के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया। ।
नीति आयोग ने अवसंरचना के विकास तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी की पुनर्स्थापना के लिए मॉडल और कार्यक्रम भी स्थापित किए हैं जैसे कि केंद्र-राज्य साझेदारी मॉडल: राज्यों को विकास सहायता सेवाएं (डीएसएसएस); और मानव पूंजी परिवर्तन के लिए सतत कार्रवाई (एसएटीएच) कार्यक्रम जिसे राज्यों को तकनीकी समर्थन प्रदान करके उनके सामाजिक क्षेत्रक संकेतकों को बेहतर बनाने में मदद करने के लिए तैयार किया गया है।
इसके अलावा, क्षेत्रीय विकासात्मक असंतुलन को ठीक करने के उद्देश्य से, नीति आयोग ने विशेष ध्यान और समर्थन की जरूरत वाले क्षेत्रों जैसे कि उत्तर पूर्वी राज्यों, द्वीप राज्यों और पहाड़ी हिमालयी राज्यों के लिए विशेष कदम उठाए हैं, जैसे कि इनकी विशिष्ट बाधाओं की पहचान करने के लिए विशेष मंचों का गठन करना, इन क्षेत्रों में सतत विकास सुनिश्चित करने के साथ-साथ इनके प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करने हेतु विशेष नीतियां बनाना।





